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"गुलाम रूहों के कारवां में । जरस की आवाज भी नहीं है ।

उठो, तमद्दुन के पासबानो । तुम्हारे आकाओं की जमीं से ।

उबल चुके जिंदगी के चश्मे । निशान सिजदों के अब जबीं से ।

मिटाओ, देखो छुपा न ले वो । लहू टपकता है आस्तीं से ।

गुलाम रूहों के कारवां में । नफस की आवाज भी नहीं है ।

उठो, मुहब्बत के पासबानो । ये कोहरो-सहरा, ये दश्तो-दरिया ।

तुम्हारे अजदाद गा चुके हैं । यहां पे वो आतिशीं तराना ।

जो गर्मिए-बज्म था, मगर अब । गुजर गया उसको इक जमाना ।

समंदे-अय्याम बर्क-पा है । उठो कि तारीख हर वरक पर ।

तुम्हारा शुभ नाम ढूंढती है । न देंगे आवाज उसके शह पर ।

जो वक्त उड़ता चला गया है । जमीन आंखों से मत कुरेदो ।

न मिल सकेंगी वो हड्डियां जो । जमीं का तारीक गहरा सीना ।

निगल चुका है--नया करीना । सिखाओ पामाल जिंदगी को ।

उठो, मजारों के पासबानो । चलो न गर्माओ जिंदगी को ।

ये ढेर सूने पड़े हैं, इन पर । कहीं से दो फूल ही चढ़ाओ ।

गुलाम रूहों के कारवां में । जरस की आवाज भी नहीं है ।"